नवरात्रि पर कौन से दिन होती है किस देवी की पूजा | Shayari Copy - All Shayari Collection

नवरात्रि पर कौन से दिन होती है किस देवी की पूजा

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नवरात्रि दुर्गा देवी का उत्सव होता है। नवरात्रि के नौ दिन नौ देवियों की पूजा की जाती है। नवरात्रि की प्रत्येक देवी शक्ति का अवतार है। नवरात्रि का त्यौहार देवी दुर्गा की महिषासुर नामक असुर के साथ हुई लड़ाई और उस पर उनकी विजय का प्रतीक है। यह साल में दो बार आता है। इस समय हम लोग वसंत नवरात्रि मना रहे हैं जो नवरात्रि का वास्तविक स्वरुप है।
क्‍या भगवान राम ने की नवरात्रि की शुरूआत?
रावण पर आक्रमण करने से पहले भगवान राम ने नवरात्रि की नौ देवियों की पूजा की थी। साल के अंत में आने वाली नवरात्रि अधिक लोकप्रिय है। हालाँकि वसंत नवरात्रि का उत्सव मां शक्ति की नौ देवियों या अवतारों को समर्पित है। यहाँ नौ देवियाँ बताई गयी हैं जिनकी पूजा नवरात्रि के नौ दिनों में की जाती है।

 पहला दिन: शैलपुत्री माता
पहला दिन: शैलपुत्री माता 
शैलपुत्री देवी का वह अवतार है जिसने पर्वतों के राजा हिमवंत (या हिमालय) की पुत्री के रूप में जन्म लिया था। इन्हें पार्वती के नाम से भी जाना जाता था। पार्वती यह नाम पर्वत शब्द से निकला है। पहाड़ को संस्कृत में पर्वत कहा जाता है। अपने पूर्व जन्म में देवी पार्वती सती थी।


एक बार प्रजापति दक्ष ने एक बहुत बड़ा यज्ञ किया। इसमें उन्होंने सारे देवताओं को अपना-अपना यज्ञ-भाग प्राप्त करने के लिए निमंत्रित किया, किन्तु शंकरजी को उन्होंने इस यज्ञ में निमंत्रित नहीं किया। सती ने जब सुना कि उनके पिता एक अत्यंत विशाल यज्ञ का अनुष्ठान कर रहे हैं, तब वहाँ जाने के लिए उनका मन विकल हो उठा।
अपनी यह इच्छा उन्होंने शंकरजी को बताई। सारी बातों पर विचार करने के बाद उन्होंने कहा- प्रजापति दक्ष किसी कारणवश हमसे रुष्ट हैं। अपने यज्ञ में उन्होंने सारे देवताओं को निमंत्रित किया है। उनके यज्ञ-भाग भी उन्हें समर्पित किए हैं, किन्तु हमें जान-बूझकर नहीं बुलाया है। कोई सूचना तक नहीं भेजी है। ऐसी स्थिति में तुम्हारा वहाँ जाना किसी प्रकार भी श्रेयस्कर नहीं होगा।'
शंकरजी के इस उपदेश से सती का प्रबोध नहीं हुआ। पिता का यज्ञ देखने, वहाँ जाकर माता और बहनों से मिलने की उनकी व्यग्रता किसी प्रकार भी कम न हो सकी। उनका प्रबल आग्रह देखकर भगवान शंकरजी ने उन्हें वहाँ जाने की अनुमति दे दी।
सती ने पिता के घर पहुँचकर देखा कि कोई भी उनसे आदर और प्रेम के साथ बातचीत नहीं कर रहा है। सारे लोग मुँह फेरे हुए हैं। केवल उनकी माता ने स्नेह से उन्हें गले लगाया। बहनों की बातों में व्यंग्य और उपहास के भाव भरे हुए थे।
परिजनों के इस व्यवहार से उनके मन को बहुत क्लेश पहुँचा। उन्होंने यह भी देखा कि वहाँ चतुर्दिक भगवान शंकरजी के प्रति तिरस्कार का भाव भरा हुआ है। दक्ष ने उनके प्रति कुछ अपमानजनक वचन भी कहे। यह सब देखकर सती का हृदय क्षोभ, ग्लानि और क्रोध से संतप्त हो उठा। उन्होंने सोचा भगवान शंकरजी की बात न मान, यहाँ आकर मैंने बहुत बड़ी गलती की है।
वे अपने पति भगवान शंकर के इस अपमान को सह न सकीं। उन्होंने अपने उस रूप को तत्क्षण वहीं योगाग्नि द्वारा जलाकर भस्म कर दिया। वज्रपात के समान इस दारुण-दुःखद घटना को सुनकर शंकरजी ने क्रुद्ध होअपने गणों को भेजकर दक्ष के उस यज्ञ का पूर्णतः विध्वंस करा दिया।

सती ने योगाग्नि द्वारा अपने शरीर को भस्म कर अगले जन्म में शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लिया। इस बार वे 'शैलपुत्री' नाम से विख्यात हुर्ईं। पार्वती, हैमवती भी उन्हीं के नाम हैं। उपनिषद् की एक कथा के अनुसार इन्हीं ने हैमवती स्वरूप से देवताओं का गर्व-भंजन किया था।

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